कोई अपना सा
अनेक चेहरों की भीड़ में
वह चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगता हैं
शायद उसके साथ कोई रिश्ता पुराना लगता है
जीवन की आपा-धापी में हो जाते हैं हम गुम
पर वह जाने कहाँ से लाती हैं
कुछ पल फुर्सत के चुन
अपने लिए नहीं, पर हमारे लिए
उन पलों में वह परियों की तरह पंख फैलाकर आती है
और हमारी परेशानियाँ अपने संग उड़ा ले जाती है
उन पलों में वह अपना हाल-ए दिल बयाँ नहीं करती
पर खामोश रहकर हमारे दर्द बाँट ले जाती है
जाने कहा से लाती है, कुछ पल फुर्सत के चुन
उन पलों में वह लगती है अपनी कोई खास
क्योंकि अपनी एक मुस्कुराहट से भर्ती है वह हमारे जीवन में एक नई आस
उन पलों में वह कोई शोर-शराबा नहीं करती
ढोल- नगाडे नहीं बजाती
बस सिर्फ "कैसे हो" हौले से पूंछकर
सच बताऊँ बस इतना ही बोलकर
हमें अपना बना ले जाती है
साथ रहकर भी लोग अपने नहीं बन पाते
वह तो दूर से ही दिल चुरा ले जाती है
ऐसे लोगों के साथ से ही, एहसास से ही
ज़िन्दगी एक खूबसूरत ग़ज़ल बन जाती है ||
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