ये बेटियाँ जाने कब बड़ी हो जाती हैं
कल शाम जब मैंने अपनी सहेली को उसकी ६ साल की बेटी के साथ टहलते देखा
तो मन जाने कहाँ बीते लम्हों में खो गया
और कुछ शब्द अपने आप कागज़ पर उतर गए |
थामा जब मैंने अपने हाथों में तुम्हारा नन्हा सा हाथ था
बड़ा ही खूबसूरत वह एहसास था
अपनी गोद के झूले में झुलाते थे तुम्हे
लोरी गाकर सुलाते थे तुम्हे
तुम्हे उंगली पकड़ कर चलना सिखाना
आज भी याद आता है
तुम्हे अपने हाथों से खाना खिलाना
कहाँ भूला जाता है
तुमने बोला जब अपना पहला शब्द था
क्या बताऊँ कितना प्रसन्न मेरा यह मन था
प्यारी प्यारी बातें तुम्हारी
न जाने सुनाती तुम कितने किस्से कहानी
दिल तो चाहता था बस यही
कि थम जाए वक़्त वहीं
पर ऐसा भी कहाँ होता है
समय तो बस हाथ से रेत सा फिसलता है
कल तक जिसको उंगली पकड़कर चलना सिखाया
आज वह मुझे लैपटॉप चलाना सिखाती है
ये बेटियां जाने कब बड़ी हो जाती हैं
मेरे हाथों से खाना खाने वाली
आज मुझे पिज़्ज़ा, बर्गर बनाकर खिलाती हैं
बुरी नज़र से बचाने के लिए कल तक
जिसको मैं काला टीका लगाती थी
आज वह eyeliner मुझे लगाती है
सच कहूं पता नहीं
ये बेटियां कब बड़ी हो जाती हैं
आज डोली में बैठकर जाती है
मेरी आँखें नम और मेरा घर सूना कर जाती हैं
ये बेटियां कब बड़ी हो जाती हैं
जहाँ भी रहो बस हँसती खेलती रहो हमेशा
दुआ बनकर यह आवाज़ सदा दिल से आती है |
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